फ़िल्म समीक्षा: ‘बाबूमोशाय बंदूकबाज़’ का निशाना चूक गया (डेढ़ स्टार)

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मुख्य कलाकार: नवाजुद्दीन सिद्दीक़ी, बिदिता बाग, जतिन गोस्वामी, दिव्या दत्ता आदि।

निर्देशक: कुशान नंदी

निर्माता: किरण श्याम श्राफ, अस्मित कुंजर, कुशान नंदी।

‘बाबूमोशाय बंदूकबाज़’ प्यार और धोखे की कहानी है. बाबू एक ऐसा कॉन्ट्रैक्ट किलर है जिसका काम पैसों के लिए लोगों की जान लेना है। एक कॉन्ट्रैक्ट के दौरान उसकी मुलाकात होती है विनीता से और वह उसे अपना दिल दे बैठता है। अब बाबू के जीवन में वैसे तो कोई बदलाव नहीं आता लेकिन, एक ठेके पर उनकी मुलाकात जतिन से होती है। वह भी एक कॉन्ट्रैक्ट किलर है. लेकिन, वह बाबू को कहता है कि बाबू उसका गुरु है बचपन से वह उसका फ्रेंड रहा है, फैन रहा है।

ऐसे में बाबू और उसकी दोस्ती बढ़ती जाती है. एक दिन उनको तीन मर्डर करने का कॉन्ट्रैक्ट मिलता है और शर्त लगती है। जब बाबू शर्त जीतने लगता है तब चेला याने जतिन बाबू को गोली मार देता है और वह एक मशहूर कॉन्ट्रैक्ट किलर बन जाता है। लगभग 8 साल बाद जब बाबू वापस आ जाता है तो सबके होश उड़ जाते हैं और यहां से शुरू होती है बदले की कहानी!

बाबू का पूरा कारवां उजड़ गया है। उसकी प्रेमिका को उसके घर के साथ जला दिया गया है. ऐसा उसके दोस्त बताते हैं। धीरे-धीरे बाबू को पता चलता है कि इस सब के पीछे आखिर है कौन? और वह सबका खून करना शुरू करता है और अंत में उसे पता चलता है एक ऐसा राज़ जिससे उसका पूरा, अस्तित्व हिल जाता है।

इसी धोखे, प्यार और दोस्ती के एलिमेंट्स को मिलाकर बनाई गई है ‘बाबूमोशाय बंदूकबाज़’। फ़िल्म की प्रोडक्शन क्वॉलिटी औसत है। फ़िल्म को जिस तरह से शूट किया गया है यूं लगता है कुशान के दिमाग में अपनी स्टाइल से ज्यादा अनुराग कश्यप की स्टाइल छाई हुई थी। मगर इसमें भी वह सफल नहीं हुए हैं। ‘बाबूमोशाय बंदूकबाज’ भले ही नवाजुद्दीन सिद्दीकी जैसे बेहतरीन अभिनेता के साथ बनाई हो लेकिन, यह 80 के दशक के किसी बदले की भावना पर बनी खून का बदला खून, सब कुछ जला कर राख कर दूंगा जैसी सी ग्रेड फिल्मों से थोड़ी ही अलग बन पाई है।

नरेशन के दौरान शायद यह फिल्म बहुत प्रभावशाली लगी हो मगर, स्क्रीन पर आते ही उसकी हवा निकल गई है. इस फ़िल्म का सबसे कमजोर हिस्सा इसका स्क्रीनप्ले और कहानी ही है। अभिनय की बात की जाए तो हमेशा की तरह नवाज पूरी तरह छाए रहे। उनका साथ बिदिता बाग ने पूरी तरह से दिया। चेले के किरदार में जतिन ने भी अच्छा परफॉर्मेंस दिया है। जीजी के रूप में दिव्या दत्ता ने अलग-अलग स्तरों पर अपनी भूमिका भली-भांति निभाई। सारे कलाकारों ने भले ही अच्छा अभिनय किया हो मगर स्क्रिप्ट डिपार्टमेंट ने उन्हें निराश ही किया है।

कुल मिलाकर यह कहा जाए तो गलत नहीं होगा कि ‘बाबूमोशाय बंदूकबाज’ एक साधारण सी फ़िल्म है, जो उम्मीदों पर खरी नहीं उतरती। नवाजुद्दीन सिद्दीकी के चाहने वाले उनकी छवि को देखते हुए यह फ़िल्म को देखने जाएंगे निराश ही होंगे।

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